दोस्तों

जीवनकथा खुद की वे सुनाते हैं दोस्तों
पर दो चार किस्से वे छुपाते हैं दोस्तों।

सडक के दोनों तरफ ये पेड बताते हैं
जो राह में नहीं आते, वे बच जाते हैं दोस्तों।

क्षितिज के उस पार मुझे जाना ही नही है
क्षितिज के बाद ढलानें शुरू हो जाती हैं दोस्तों।

आलसी नहीं हैं वे, जो रास्ते में रुक गये
पर राह खोजते हुए, वे उलझ जाते हैं दोस्तों।

इन्सान जब अंदर से टूटने लगता है
तो सब लोग दूर नज़र आते हैं दोस्तों।

© भूषण कुलकर्णी

Leave a comment