ठहराव

आज ढलते ढलते सूरज थम सा गया है,
अपने कोमल किरणों से कुछ कह रहा है।

“कई दिनों से तुम्हें व्यस्त देखता हूँ,
तुम्हें समय मिलेगा, इसकी प्रतीक्षा करता हूँ।

आज वक्त है, हो जाए दीदार-ए-नजर,
कुछ पल मै भी ठहरुँ, तु भी ठहर।

लौटते पंछियों के मीठे सुरों की दाद दे,
इन पेड-पौधों की सुन्दरता निहार ले।

कुछ पल तो टहलना इनकी गलियों मे,
सुगंधित पुष्प लिये खडे है इंतजार मे।

जिन रास्तों पे चलता है अपनी ही धुन मे,
प्यार भरी निगाहों से उन्हें भी देख ले।

साइकिल के चक्कों को अब गती दे,
इन हवाओं से भी कुछ बात कर ले।

दिन के आखिरी पल आराम से गुजारना,
नया दिन, नयी जगह, नए से शुरु करना।

तुम जहां भी रहो, याद रखना एक बात,
हम तुम्हारे मित्र हैं, सदा रहेंगे साथ।”

© भूषण कुलकर्णी

During the last semester at IIT Kharagpur, I had several photo-sessions. This is photo-shoot with my special friends…

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