अँधेरा

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खुद से उम्मीदें कुछ ज्यादा बडी थी,
ख्वाब और हकीकत, दूरियाँ बढी थी।
शायद सब कुछ नष्ट हुआ है,
लेकिन हाँ, जिंदा हूँ, यही बहुत है।

गम की गलियों मे पहली बार चल रहा हूँ,
भरी महफिल मे अकेला पहली बार हुआ हूँ।
सब तरफ अँधेरा, एक दीपक की प्रतीक्षा है,
वह बाहर मिलेगा, या अंदर, यही सवाल है।

मन का दीपक प्रकाश नही देता है,
या बाहरी जगमगाहट से धुंधला हुआ है?
हर दीपक को अलग समझना होगा,
अपना दीपक बुझाकर क्या लाभ होगा?

घर पे बात करने का दिल नही करता,
सच्चा दोस्त कौन, समझ नही आता।
अपनों को शायद खुशियाँ नही दे सकूंगा,
पर उन्हें गम का सदमा तो नही दूंगा।

जिंदगी के इस पडाव मे,
खुद को संभालता हूँ।
यह समय भी गुजर जाएगा,
इसी उम्मीद मे जी लेता हूँ।

(Concerning about suicide incidents happened during last semester at IITKGP, this poem thinks from the point of view of a depressed student.)

© भूषण कुलकर्णी

2 Comments

  1. Unknown's avatar

    It really helps to Students in their bad conditions👌🏻👌🏻👌🏻Grt going Bhushan👍🏻Keep it up😎

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