अनबन

तुम्हारी एक गलती, मै सह नहीं पाया
अपनी गलती तो, देख ही नहीं पाया।
पहले भी कई झगडे किये थे हमने,
पर यह अनबन, सुलझा न पाया।

गुस्से का नशा तो, उसी रात उतर गया
पर अजीब माहौल मे, बात नहीं कर पाया।
फिर दूसरी बातों मे, दिल को बहलाना चाहा
पर समय बीता, मौका छूटा, कभी लौट न आया।

आज भी तुम्हारे खयाल से, दूर दूर भागता हूँ
तुम्हारा जिक्र होता है, तो खामोश हो जाता हूँ।
तुम सामने आते हो, पर अनदेखा करता हूँ
दिल मे दर्द होता है, पर सीना ताने चलता हूँ।

फिर भी हो सके, तो मुझे समझ लेना
थोडा सा मुस्कुराकर, एक-दो बातें करना।
अपनी राहें अलग सही, पर मुस्कुराकर चल पडेंगे
शायद वे पुराने दिन, फिर से लौट आएँगे।

© भूषण कुलकर्णी

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