हम राह पे चलते चले गये
अफसाने यूँ ही बनते चले गये।
जिनकी याद हमेशा बनी रहे
वे लोग यूँ ही मिलते चले गये।
कडी धूप मिली राह मे कहीं
उसमे भी कुछ फूल खिलते चले गये।
फूलों से भरी थी जब हमारी राहें
उनके साथ कांटों को भी सींचते चले गये।
जो ख्वाब मे भी मुश्किल लगते थे
वे काज यूँ ही सरल बनते चले गये।
लिखना चाहते थे कुछ शब्द
यूँ ही शायर बनते चले गये।
खुदा पूछे, बता बंदे तेरी रजा क्या है
बंदा कहे,
सफर यूँ ही चलता रहे,
हम यूँ ही चलते रहे।
© भूषण कुलकर्णी