दीपकज्योती

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तेल, वात, हवा, हे स्थान आणि अग्नी
पंचतत्त्व एकत्र येता बनते मी ज्योती…

काचेचा महाल असो वा मातीची पणती
घरातील बैठक असो वा देवाची समई
दीपमाला सोबतीला वा असेन एकाकी
सदा प्रकाशते, तेच तेज, तीच ज्योती!

तेल किती, वात किती, याची चिंता कशासाठी?
पाऊस-वार्याची चाहूल जरी, नसे हुरहुर मानसी!
मालक रक्षण करेल का, ही शंका नको अंतरी
हा क्षण उजळते, तेच तेज, तीच ज्योती!

वारा सुटता तडफडते, पण मुळास धरून राहते
पुन्हा नव्याने उभारी घेते, मी ज्योती तेवत राहते…

© भूषण कुलकर्णी

अंताक्षरी

तीन पिढ्या एकत्र येतो
दूरचे नातेही बळकट करतो
सप्तसुरांत सर्व गुणगुणतो
आज अंताक्षरीचा खेळ रंगतो

आजी गुणगुणते जात्यावरची ओवी
भरदुपारी कोणी गाते उगाच अंगाई
भूपाळी, आरत्यांसह लावणीही गातो
आज अंताक्षरीचा खेळ रंगतो

कोणी गाते भक्ती-भावगीते
कधी धडाक्यात वाजती सिनेगीते
किशोर, रफी यांना श्रद्धांजली देतो
आज अंताक्षरीचा खेळ रंगतो

आठवणींचे कप्पे पुन्हा उजळतो
एखादी धुन ऐकून भारावतो
कवितांचा नव्याने आस्वाद घेतो
आज अंताक्षरीचा खेळ रंगतो

© भूषण कुलकर्णी

एकांत

चंद्राकडे पाहतानाही शांत राहते मन
एकटाच सुखी आहे, नको कोणाची आठवण!

वर्षाधारा, रेशीमधागा, गुलाबपाकळ्या, शुभ्र चांदण्या
आहेत तशा असू देत, नको कोणाची उपमा!

गुलाबी थंडी असो, वा बहर वसंताचा
एकटाच मजा करतो, नको विरह विकतचा!

मन, ह्रदय, कविता, भावना, आहेत आम्हालाही
काय बिघडले जर ते नाही दिले कोणालाही?

दिसेल कोणी सुंदर, बोलणेही मधाळ
पुढील योजना बसून बोलू, उगाच का तळमळ?

मिळेल तेव्हा मिळेल ती, आज रहा निवांत
पुन्हा मिळेल का सांग, असा हा एकांत?

© भूषण कुलकर्णी

मै विभीषण

(रावणदहन पर विभीषण यह सोचते होंगे…)

बचपन से हम साथ रहे थे
आप बडे भाई, पिता जैसे हुए थे।
आप की छत्रछाया मे पलेपढे थे
आप ही रक्षक, मार्गदर्शक बने थे।

आप जैसा राजा, कोई दूजा न देखा था
सुवर्ण की लंका का त्रिलोक में नाम था।
प्रजाहितदक्ष राजा पर प्रजा का भी प्रेम था
आप का शौर्य और ज्ञान अपार, असीम था।

आप की भक्ती से महादेव प्रसन्न हुए थे
तपस्या, पूजा, सेवा से मनमंदिर मे बसते थे।
आप की पुकार पर समक्ष प्रकट होते थे
हम जैसे भक्तों के लिये आप ही आदर्श थे।

पर एक गलत कदम ने सब मिटा डाला
सीतामैया का अपमान यह राज्य न सह पाया।
वह एक कदम कभी पीछे न लिया
उसके खातिर सबकुछ झोंक दिया।

महादेव के संदेश को अनसुना किया
देवी मंदोदरी की बिनती को ठुकरा दिया।
मेरा भी अपमान तथा बहिष्कार किया
मेरे इष्टदेव के खिलाफ युद्ध छेड दिया।

दिल पर बोझ रखकर मै आप के खिलाफ गया
धर्म की राह पर श्रीरामजी का साथ दिया।
रामनाम ही मेरा सर्वस्व था
यह राजमुकुट तो कभी न चाहा था।

हर साल आप को जलता देखता हूँ
मन ही मन आंसू बहाता हूँ।
घर का भेदी कहलाता है यह विभीषण
पर आज भी धर्मपथ पर चलता हूँ।

© भूषण कुलकर्णी

जीवनपुष्प

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फुलासारखे हे जीवन असावे!

बालपणी पानांच्या मायेत वाढावे
शिस्तीच्या देठाला धरून रहावे
पावसात भिजावे, वार्यावर डोलावे
फुलासारखे हे जीवन असावे!

कोणीतरी अलगद घेऊन जावे
वा झाडावरच झुलत रहावे
कुठेही जावे, सुगंध द्यावे
फुलासारखे हे जीवन असावे!

तिच्या केसांत रममाण व्हावे
वा ईश्वरचरणी समर्पण करावे
तिच्याकडून भक्तीरुपे ईश्वराकडे जावे
वा ईश्वराकडून प्रसादरुपे तिच्याकडे यावे
फुलासारखे हे जीवन असावे!

देह सुकताना निर्माल्य व्हावे
माय-मातीच्या कुशीत निजावे
तिथेच जन्माचे सार्थक व्हावे
फुलासारखे हे जीवन असावे!

© भूषण कुलकर्णी

यूँ ही

हम राह पे चलते चले गये
अफसाने यूँ ही बनते चले गये।
जिनकी याद हमेशा बनी रहे
वे लोग यूँ ही मिलते चले गये।

कडी धूप मिली राह मे कहीं
उसमे भी कुछ फूल खिलते चले गये।
फूलों से भरी थी जब हमारी राहें
उनके साथ कांटों को भी सींचते चले गये।

जो ख्वाब मे भी मुश्किल लगते थे
वे काज यूँ ही सरल बनते चले गये।
लिखना चाहते थे कुछ शब्द
यूँ ही शायर बनते चले गये।

खुदा पूछे, बता बंदे तेरी रजा क्या है
बंदा कहे,
सफर यूँ ही चलता रहे,
हम यूँ ही चलते रहे।

© भूषण कुलकर्णी

कुरुक्षेत्र

आज सारा भारत कुरुक्षेत्र बन गया है…

आज भी विदेश से शकुनी द्युत खेलने आते है
किसी को भांजा बनाकर हमारे खिलाफ भडकाते है।

द्रौपदी के खुले केश, न्याय की प्रतीक्षा करते है
भरी सभा मे खामोशी की वजह जानना चाहते है।

धृतराष्ट्र जैसा अँधेरा, या गांधारी की पट्टी है
जो न्याय-व्यवस्था की दृष्टी को धुंधली करती है।

आरक्षण का भीष्म भी हमारे खिलाफ खडा है
हमारे अपने भाईयों को इसने हमसे तोडा है।

शिक्षा-व्यवस्था तो गुरू द्रोण की तरह लगती है
सिखाती है धर्म-शास्त्र, पर अधर्म नही रोकती है।

कर्ण का एक अंश भी हम सबके अंदर बसता है
जो मजबूरी मे आहें भरते गलत रास्ते चलता है।

इस कुरुक्षेत्र मे, अब आप आइये
हे मधुसूदन, उचित राह दिखाइये!

© भूषण कुलकर्णी

वृक्षमानस

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मंद पावसात मी, मजेत भिजतोय रे
बंद खिडकीतून तू, का फक्त पाहतोस रे?

गार वार्याची झुळूक चहूबाजूंनी खेळते रे
तरी त्या यंत्राची हवा तुला का भावते रे?

माझ्या पानापानांतूनी, ओघळती या अमृतधारा
ये इकडे, बघ थोडे, माझ्यासवे भिजून जरा!

सुहास्यवदनी, धुंद होऊनी, मनास थोडे फुलू दे
चार भिंती, चारचौघे, ही शिस्त थोडी मोडू दे!

आलास तू, भेटलास तू, पण लगेच का निघालास तू?
त्या दोन फिरत्या काट्यांमध्ये, असे काय पाहिलेस तू?

तुझे हे वागणे, मला तरी कळत नाही
भेटू पुन्हा, वा खिडकीतूनच बोलू काही!

© भूषण कुलकर्णी

दीक्षांत

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आज कुछ अलग ही समा है
तन भी आसमान मे, मन भी आसमान मे!

जिन रास्तों के हर मोड खूबसूरत थे
उनकी मंजिल तक आज पहुंच रहे है।

कई दिनों से चल रहे थे इस मंजिल के लिए
यहाँ पहुंचे तो लगा, कुछ जल्दी आ गए।

याद आती है वे गलियाँ जिनसे हम गुजरे थे
हर कदम पर थोडा-थोडा बेहतर हुए थे।

उन राहों पर आज फिर से चलेंगे
जिनके साथ चले थे, उन साथियों से मिलेंगे।

यही इस मंजिल की खासियत है
सभी साथी खुशी मे साथ-साथ है।

© भूषण कुलकर्णी

अनबन

तुम्हारी एक गलती, मै सह नहीं पाया
अपनी गलती तो, देख ही नहीं पाया।
पहले भी कई झगडे किये थे हमने,
पर यह अनबन, सुलझा न पाया।

गुस्से का नशा तो, उसी रात उतर गया
पर अजीब माहौल मे, बात नहीं कर पाया।
फिर दूसरी बातों मे, दिल को बहलाना चाहा
पर समय बीता, मौका छूटा, कभी लौट न आया।

आज भी तुम्हारे खयाल से, दूर दूर भागता हूँ
तुम्हारा जिक्र होता है, तो खामोश हो जाता हूँ।
तुम सामने आते हो, पर अनदेखा करता हूँ
दिल मे दर्द होता है, पर सीना ताने चलता हूँ।

फिर भी हो सके, तो मुझे समझ लेना
थोडा सा मुस्कुराकर, एक-दो बातें करना।
अपनी राहें अलग सही, पर मुस्कुराकर चल पडेंगे
शायद वे पुराने दिन, फिर से लौट आएँगे।

© भूषण कुलकर्णी