(रावणदहन पर विभीषण यह सोचते होंगे…)
बचपन से हम साथ रहे थे
आप बडे भाई, पिता जैसे हुए थे।
आप की छत्रछाया मे पलेपढे थे
आप ही रक्षक, मार्गदर्शक बने थे।
आप जैसा राजा, कोई दूजा न देखा था
सुवर्ण की लंका का त्रिलोक में नाम था।
प्रजाहितदक्ष राजा पर प्रजा का भी प्रेम था
आप का शौर्य और ज्ञान अपार, असीम था।
आप की भक्ती से महादेव प्रसन्न हुए थे
तपस्या, पूजा, सेवा से मनमंदिर मे बसते थे।
आप की पुकार पर समक्ष प्रकट होते थे
हम जैसे भक्तों के लिये आप ही आदर्श थे।
पर एक गलत कदम ने सब मिटा डाला
सीतामैया का अपमान यह राज्य न सह पाया।
वह एक कदम कभी पीछे न लिया
उसके खातिर सबकुछ झोंक दिया।
महादेव के संदेश को अनसुना किया
देवी मंदोदरी की बिनती को ठुकरा दिया।
मेरा भी अपमान तथा बहिष्कार किया
मेरे इष्टदेव के खिलाफ युद्ध छेड दिया।
दिल पर बोझ रखकर मै आप के खिलाफ गया
धर्म की राह पर श्रीरामजी का साथ दिया।
रामनाम ही मेरा सर्वस्व था
यह राजमुकुट तो कभी न चाहा था।
हर साल आप को जलता देखता हूँ
मन ही मन आंसू बहाता हूँ।
घर का भेदी कहलाता है यह विभीषण
पर आज भी धर्मपथ पर चलता हूँ।
© भूषण कुलकर्णी