बहाव

क्या कहूं तुम्हारे बहाव पर?
रह गया मैं हमेशा किनारे पर

गलत फहमी को क्यों दिल में रखा?
सच्चे साथी कम होने पर

दिल बारबार पीछे देखता है
आगे का रास्ता धुंधला दिखने पर

दरवाजा खुला ही रखा है
एक अवसर निकल जाने पर

याद यहाँ की यहीं खतम हो जाए
फिर बोझ न रहेगा अगले जनम पर

© भूषण कुलकर्णी

दोस्तों

जीवनकथा खुद की वे सुनाते हैं दोस्तों
पर दो चार किस्से वे छुपाते हैं दोस्तों।

सडक के दोनों तरफ ये पेड बताते हैं
जो राह में नहीं आते, वे बच जाते हैं दोस्तों।

क्षितिज के उस पार मुझे जाना ही नही है
क्षितिज के बाद ढलानें शुरू हो जाती हैं दोस्तों।

आलसी नहीं हैं वे, जो रास्ते में रुक गये
पर राह खोजते हुए, वे उलझ जाते हैं दोस्तों।

इन्सान जब अंदर से टूटने लगता है
तो सब लोग दूर नज़र आते हैं दोस्तों।

© भूषण कुलकर्णी

सहानुभूति

रामायण के अर्थ कुछ बदल रहे
रावण की अच्छाई के चर्चे हो रहे

महान भक्त था रावण, ये स्वीकार करना चाहिये
पर रामजी का शिवसमर्पण भी समझना चाहिये
स्वार्थ को छोडे बिना क्या भक्ती हो सके?
अहंकार के बादल भक्ती को ढक लिये
रावण की अच्छाई के चर्चे हो रहे

राम भरत के लिये अयोध्या राज्य छोडता है
पर रावण अपने भाई को अपमानित करता है
राज्य और परिवार को युद्ध में झोंक दे
पर बहन के लिये किया सीताहरण, ऐसा कहे
रावण की अच्छाई के चर्चे हो रहे

ये सहानुभूति सत्य को छुपा रही है
दुर्जनोंके दुर्गुणोंको माफ कर रही है
दुष्कर्म और दुर्भाग्य की हो रही मिलावटें
अब हमारा कार्य है, सत्य को जान ले
रावण की अच्छाई के चर्चे हो रहे

© भूषण कुलकर्णी

चढान

Hindi translation of my Marathi Ghazal चढाई

सत्य बताते वक्त सबसे लडना पडा
अंत में झूठ का धंदा सीखना पडा।

वो चढान चढते हुए बस इतनी तकलीफ हुई
खुद को संभालने के लिये थोडा झुकना पडा।

बालक की जिस कला का बोलबाला हुआ
वही नाटक जीवन भर उसे निभाना पडा।

मुझे क्या पसंद है, कभी सवाल नही आया
बकरियों की तरह झुंड में चलना पडा।

कार्य ये मेरा नही, मार्ग ये मेरा नही
ये समझने के लिये इतने साल पढना पडा।

आंसुओं से सजी थी महफिलें सारी
सीधीसाधी हँसी को दबाना पडा।

शांती से समझाया तो उन्होंने सुना नही
शांती के लिये ही फिर शस्त्र उठाना पडा।

इस पामर को क्या भगवान मिलेंगे
महान संतोंको भी कितना रिझाना पडा…

© भूषण कुलकर्णी

मोमबत्ती

अपनी ही मस्ती में खोकर चलता हूँ मै
राह में थोडासा सत्य चुनकर चलता हूँ मै।

वसंत ऋतु आयी, कभी पता ही नही चला
लक्ष्य की तरफ ही ध्यान देकर चलता हूँ मै।

सुनाई नहीं देती है जिंदा लोगोंकी पुकार
आत्मा के लिए मोमबत्ती लेकर चलता हूँ मै।

शौकीन कर्जा वे चुका नहीं पाते
उन्हें जरासा चंदा देकर चलता हूँ मै।

कैसे देख पाऊंगा ये रंग इंसानों के?
फिर से अपनी आँखे मूँदकर चलता हूँ मै।

(Hindi translation of my Marathi ghazal मेणबत्ती)

© भूषण कुलकर्णी

राम कहें

कभी रोकर तो कभी खिलकर राम कहें
बस इतना हो, उन्हें समझकर राम कहें।

पत्थर से दिल को रामचरण दिख जाएँ
अहिल्या जैसे मुक्त होकर राम कहें।

इन आँखों से राम दर्शन न होंगे तो
भरत की तरह चरण पूजकर राम कहें।

दिल की झोपडी को साफ करते रहें
शबरी जैसे राह देखकर राम कहें।

अधर्म की लंका देखकर न घबराएं
हनुमान जैसे वो जलाकर राम कहें।

बिछडे हुए ही सही, बालक हैं उनके
लव-कुश की तरह उन्हें मिलकर राम कहें।

© भूषण कुलकर्णी

सूर्यपुत्र

अपमान की ठोकरोंसे मन आहत हुआ था
अबतक मेरा मूल स्वरूप अनजान ही रहा था।

हे कृष्ण,
अँधेरे मे भटकते वक्त आपने मार्ग दिखाया
इस सूर्यकिरण को ही आपने प्रकाश दिखाया!

रहस्य सुलझ गये आज जीवनभर के
कवच, कुंडल, गंगाजल, सूर्यकिरणोंके।

पर जो मार्ग दिखाया, वह पीछे छूट गया
सत्य समझने मे बहुत विलम्ब हो गया।

आप छोड गये गोकुल, यशोदामैया को
पर मै कैसे भूल जाऊं मेरी राधामाँ को?

दुर्योधन की मित्रता बंधुप्रेम से प्यारी है
सूतोंका प्यार राजमुकुट पर भारी है!

बंधु, कीर्ति, राज्य पर मोहित नही होगा
यह सूर्यकिरण एक ही दिशा से जायेगा।

अब महायुद्ध मे तांडव करेगा
सूर्यकिरण सारे कृष्णमेघ भेदेगा!

© भूषण कुलकर्णी

इल्लू

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वे छोटे से दिये, वह बंबू की चटाई
सोचा न था, यूँ कमाल कर दिखाएगी!

दीप से दीप जुडते गये, चित्ररेखाओंमें सजते गये।
फिर आई दिवाली की शाम, साथ-साथ जगमग हुए।

जैसे ही दृश्य दर्शित हुआ, हमारी आँखें चमक उठी।
शब्दोंमें क्या बयान करे, आनंद की जो अनुभूति हुई!

कभी श्रीकृष्ण आकर गीता सुनाते
कभी हनुमानजी लंका जलाते।
कभी कर्ण का रथ फँसता
कभी सीतादेवी की अग्निपरीक्षा।

वे दिये कुछ ऐसे रोशन हुए
दिल कहे, एक दीपक बन जाए!
सबके साथ मिलकर नयी दुनिया बनाये
जीवन के बाद भी मधुर स्मृति छोड जाए!

Illumination and Rangoli make Diwali at IIT Kharagpur very special. This poem describes Illumination (illu).

© भूषण कुलकर्णी

मै विभीषण

(रावणदहन पर विभीषण यह सोचते होंगे…)

बचपन से हम साथ रहे थे
आप बडे भाई, पिता जैसे हुए थे।
आप की छत्रछाया मे पलेपढे थे
आप ही रक्षक, मार्गदर्शक बने थे।

आप जैसा राजा, कोई दूजा न देखा था
सुवर्ण की लंका का त्रिलोक में नाम था।
प्रजाहितदक्ष राजा पर प्रजा का भी प्रेम था
आप का शौर्य और ज्ञान अपार, असीम था।

आप की भक्ती से महादेव प्रसन्न हुए थे
तपस्या, पूजा, सेवा से मनमंदिर मे बसते थे।
आप की पुकार पर समक्ष प्रकट होते थे
हम जैसे भक्तों के लिये आप ही आदर्श थे।

पर एक गलत कदम ने सब मिटा डाला
सीतामैया का अपमान यह राज्य न सह पाया।
वह एक कदम कभी पीछे न लिया
उसके खातिर सबकुछ झोंक दिया।

महादेव के संदेश को अनसुना किया
देवी मंदोदरी की बिनती को ठुकरा दिया।
मेरा भी अपमान तथा बहिष्कार किया
मेरे इष्टदेव के खिलाफ युद्ध छेड दिया।

दिल पर बोझ रखकर मै आप के खिलाफ गया
धर्म की राह पर श्रीरामजी का साथ दिया।
रामनाम ही मेरा सर्वस्व था
यह राजमुकुट तो कभी न चाहा था।

हर साल आप को जलता देखता हूँ
मन ही मन आंसू बहाता हूँ।
घर का भेदी कहलाता है यह विभीषण
पर आज भी धर्मपथ पर चलता हूँ।

© भूषण कुलकर्णी

यूँ ही

हम राह पे चलते चले गये
अफसाने यूँ ही बनते चले गये।
जिनकी याद हमेशा बनी रहे
वे लोग यूँ ही मिलते चले गये।

कडी धूप मिली राह मे कहीं
उसमे भी कुछ फूल खिलते चले गये।
फूलों से भरी थी जब हमारी राहें
उनके साथ कांटों को भी सींचते चले गये।

जो ख्वाब मे भी मुश्किल लगते थे
वे काज यूँ ही सरल बनते चले गये।
लिखना चाहते थे कुछ शब्द
यूँ ही शायर बनते चले गये।

खुदा पूछे, बता बंदे तेरी रजा क्या है
बंदा कहे,
सफर यूँ ही चलता रहे,
हम यूँ ही चलते रहे।

© भूषण कुलकर्णी