वृक्षमानस

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मंद पावसात मी, मजेत भिजतोय रे
बंद खिडकीतून तू, का फक्त पाहतोस रे?

गार वार्याची झुळूक चहूबाजूंनी खेळते रे
तरी त्या यंत्राची हवा तुला का भावते रे?

माझ्या पानापानांतूनी, ओघळती या अमृतधारा
ये इकडे, बघ थोडे, माझ्यासवे भिजून जरा!

सुहास्यवदनी, धुंद होऊनी, मनास थोडे फुलू दे
चार भिंती, चारचौघे, ही शिस्त थोडी मोडू दे!

आलास तू, भेटलास तू, पण लगेच का निघालास तू?
त्या दोन फिरत्या काट्यांमध्ये, असे काय पाहिलेस तू?

तुझे हे वागणे, मला तरी कळत नाही
भेटू पुन्हा, वा खिडकीतूनच बोलू काही!

© भूषण कुलकर्णी

दीक्षांत

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आज कुछ अलग ही समा है
तन भी आसमान मे, मन भी आसमान मे!

जिन रास्तों के हर मोड खूबसूरत थे
उनकी मंजिल तक आज पहुंच रहे है।

कई दिनों से चल रहे थे इस मंजिल के लिए
यहाँ पहुंचे तो लगा, कुछ जल्दी आ गए।

याद आती है वे गलियाँ जिनसे हम गुजरे थे
हर कदम पर थोडा-थोडा बेहतर हुए थे।

उन राहों पर आज फिर से चलेंगे
जिनके साथ चले थे, उन साथियों से मिलेंगे।

यही इस मंजिल की खासियत है
सभी साथी खुशी मे साथ-साथ है।

© भूषण कुलकर्णी

अनबन

तुम्हारी एक गलती, मै सह नहीं पाया
अपनी गलती तो, देख ही नहीं पाया।
पहले भी कई झगडे किये थे हमने,
पर यह अनबन, सुलझा न पाया।

गुस्से का नशा तो, उसी रात उतर गया
पर अजीब माहौल मे, बात नहीं कर पाया।
फिर दूसरी बातों मे, दिल को बहलाना चाहा
पर समय बीता, मौका छूटा, कभी लौट न आया।

आज भी तुम्हारे खयाल से, दूर दूर भागता हूँ
तुम्हारा जिक्र होता है, तो खामोश हो जाता हूँ।
तुम सामने आते हो, पर अनदेखा करता हूँ
दिल मे दर्द होता है, पर सीना ताने चलता हूँ।

फिर भी हो सके, तो मुझे समझ लेना
थोडा सा मुस्कुराकर, एक-दो बातें करना।
अपनी राहें अलग सही, पर मुस्कुराकर चल पडेंगे
शायद वे पुराने दिन, फिर से लौट आएँगे।

© भूषण कुलकर्णी

जीवनझरा

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मेघ वर्षले, धरणीवर अवतरले
छोटे जलप्रवाह, एकत्र मिसळले
आता सर्व सोबत वाहणे, हेच जीवनगाणे!

मऊमऊ माती, सोबत येती
काही दगड, उगाच खुपती
तेही होतील मऊ कालांतराने, हेच जीवनगाणे!

कोणी गुणगान गाती, काव्यसुमने उधळती
कोणी पाहत राहती, कोणी वाट अडवती
तरी खळखळून हसत वाहणे, हेच जीवनगाणे!

इवलीशी रोपे, कुशीत फुलती
काही फुले, काही काटे देती
सर्वांना प्रेम देत राहणे, हेच जीवनगाणे!

तो विशाल सागर, माझे ध्येय थोर
पोहोचेन तिथवर, वा सुकेन वाटेवर
तरी पुढे जात राहणे, हेच जीवनगाणे!

© भूषण कुलकर्णी

अँधेरा

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खुद से उम्मीदें कुछ ज्यादा बडी थी,
ख्वाब और हकीकत, दूरियाँ बढी थी।
शायद सब कुछ नष्ट हुआ है,
लेकिन हाँ, जिंदा हूँ, यही बहुत है।

गम की गलियों मे पहली बार चल रहा हूँ,
भरी महफिल मे अकेला पहली बार हुआ हूँ।
सब तरफ अँधेरा, एक दीपक की प्रतीक्षा है,
वह बाहर मिलेगा, या अंदर, यही सवाल है।

मन का दीपक प्रकाश नही देता है,
या बाहरी जगमगाहट से धुंधला हुआ है?
हर दीपक को अलग समझना होगा,
अपना दीपक बुझाकर क्या लाभ होगा?

घर पे बात करने का दिल नही करता,
सच्चा दोस्त कौन, समझ नही आता।
अपनों को शायद खुशियाँ नही दे सकूंगा,
पर उन्हें गम का सदमा तो नही दूंगा।

जिंदगी के इस पडाव मे,
खुद को संभालता हूँ।
यह समय भी गुजर जाएगा,
इसी उम्मीद मे जी लेता हूँ।

(Concerning about suicide incidents happened during last semester at IITKGP, this poem thinks from the point of view of a depressed student.)

© भूषण कुलकर्णी

ठहराव

आज ढलते ढलते सूरज थम सा गया है,
अपने कोमल किरणों से कुछ कह रहा है।

“कई दिनों से तुम्हें व्यस्त देखता हूँ,
तुम्हें समय मिलेगा, इसकी प्रतीक्षा करता हूँ।

आज वक्त है, हो जाए दीदार-ए-नजर,
कुछ पल मै भी ठहरुँ, तु भी ठहर।

लौटते पंछियों के मीठे सुरों की दाद दे,
इन पेड-पौधों की सुन्दरता निहार ले।

कुछ पल तो टहलना इनकी गलियों मे,
सुगंधित पुष्प लिये खडे है इंतजार मे।

जिन रास्तों पे चलता है अपनी ही धुन मे,
प्यार भरी निगाहों से उन्हें भी देख ले।

साइकिल के चक्कों को अब गती दे,
इन हवाओं से भी कुछ बात कर ले।

दिन के आखिरी पल आराम से गुजारना,
नया दिन, नयी जगह, नए से शुरु करना।

तुम जहां भी रहो, याद रखना एक बात,
हम तुम्हारे मित्र हैं, सदा रहेंगे साथ।”

© भूषण कुलकर्णी

During the last semester at IIT Kharagpur, I had several photo-sessions. This is photo-shoot with my special friends…

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घोटभर

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चिंतांचे काहूर
विचारांचा पूर
प्रश्न अपार
एकच उत्तर
घ्यावी घोटभर!

काॅलेजचे आवार
बाराचा सुमार
वाढदिवसाचा वार
आता कशाचा उशीर
घ्यावी घोटभर!

जमला मित्रपरिवार
खूप दिवसांनंतर
गप्पा, गीतांचे सुर
जुन्याच कट्ट्यावर
घ्यावी घोटभर!

मन सैरभैर
आठवणी फार
विरह तीव्र
तिच्या फोटोसमोर
घ्यावी घोटभर!

एकटाच गच्चीवर
शांत रात्रप्रहर
पौर्णिमेचा चंद्र
चला जाऊ चंद्रावर
घ्यावी घोटभर!

© भूषण कुलकर्णी

(संकल्पना: गोपीनाथ लंगोटे)

अथांग

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हे सागरा! किती शांत गंभीर दिसशी
खोल त्या डोहामध्ये काय बरे लपवशी?
सर्व आघात सोसूनही मर्यादा पाळिसी
साक्षात् भीष्म पितामह शोभसी!

अथांग तू, अपार तू, अनंत जलराशी
ध्यानस्थ योगी जणू, तेजस्वी दिसशी
कधी सुमधुर हास्य तर कधी तांडव करिसी
नटराज रूद्र महादेव दिसशी!

दिवसभर तापून जलचक्र चालविसी
मोती शिंपले रत्ने भरभरून देसी
परि मधुर जलवाणीत मीठ मिसळसी
कधी तू सक्षम पिताच भासशी!

कित्येक जीवांना उदरात धारिसी
त्यांचे निष्ठेने रक्षण करिसी
जलरूप मायेचा पदर ओढिसी
तू वात्सल्यपूर्ण आईच दिसशी!

तुज पाहता फिटे डोळ्यांचे पारणे
उजळून येई मनातील चांदणे
हळुवार लाटांशी हितगुज करणे
तुझे मित्ररुप सर्वथा आवडे!

© भूषण कुलकर्णी

स्मृतिचित्र

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कुछ दिन बीते पलों में,
कुछ पल बीते दिनों में।

कुछ रातें शांत अकेली,
तो कुछ उत्सव मनाती।

इन दिनों बहुत कुछ सीखा,
विविध अनुभव-भूषित हुआ।

मीठी बातें, मुस्कराते चेहरे,
कुछ अपने, कुछ पराये।

कुछ अध्यापक चाव से पढाते,
तो कुछ हमें रास न आते।

मित्रों की महफिलें सजी,
जीवनभर की यादें बनी।

बंगाल की यह मीठी वाणी,
‘भालो’ के बाद पूरी अनजानी।

यहाँ के लोग, पेड, बरसात,
खडगपुर की निराली है बात!

इन यादों के गीत गुनगुनाता रहुंगा,
अभी चलता हूँ दोस्तों, मिलता रहुंगा।

© भूषण कुलकर्णी

कुठे निमाले काव्य तुझे?

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चिंतेच्या ढिगार्यात
भयाच्या अंधारात
अनिश्चिततेच्या सावटात
वासनेच्या वादळात
का हरवले काव्य तुझे?

ते निर्मळ मन
भावनिक आत्मकथन
माणुसकीचे दोन क्षण
रम्य निसर्ग भ्रमण
यांसह गेले काव्य तुझे?

काव्य हे जीवन
साक्षात आनंदवन
माणसाचे माणूसपण
कालचक्राचे वंगण
समजून घे काव्य तुझे!

निर्मळ मनात
प्रेमळ बंधनात
दैनिक जीवनात
वा सुखस्वप्नात
पुन्हा प्रकटेल काव्य तुझे!

© भूषण कुलकर्णी