कुरुक्षेत्र

आज सारा भारत कुरुक्षेत्र बन गया है…

आज भी विदेश से शकुनी द्युत खेलने आते है
किसी को भांजा बनाकर हमारे खिलाफ भडकाते है।

द्रौपदी के खुले केश, न्याय की प्रतीक्षा करते है
भरी सभा मे खामोशी की वजह जानना चाहते है।

धृतराष्ट्र जैसा अँधेरा, या गांधारी की पट्टी है
जो न्याय-व्यवस्था की दृष्टी को धुंधली करती है।

आरक्षण का भीष्म भी हमारे खिलाफ खडा है
हमारे अपने भाईयों को इसने हमसे तोडा है।

शिक्षा-व्यवस्था तो गुरू द्रोण की तरह लगती है
सिखाती है धर्म-शास्त्र, पर अधर्म नही रोकती है।

कर्ण का एक अंश भी हम सबके अंदर बसता है
जो मजबूरी मे आहें भरते गलत रास्ते चलता है।

इस कुरुक्षेत्र मे, अब आप आइये
हे मधुसूदन, उचित राह दिखाइये!

© भूषण कुलकर्णी

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